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Showing posts from June, 2024

3. अक्ल बड़ी जाँ म्हैं कनै बगुला भगत (पंचतंत्र-मित्र भेद)

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  पंचतंत्र दियाँ कथाँ 3.   अक्ल बड़ी जाँ म्हैं तरकीब लगायी नैंं जेह्ड़ा कम्म हौयी जाँदा सैह् ताकता नैंं नीं हौयी पाँदा है।      इक जगह बड़ दे दरख्ते दे इक बड़े ढोढ़ च इक कौवा-कौवी रैंह्दे थे।  तिस ही ढोढ़  दे बक्खैं इक काळा सर्प भी रैंह्दा था। सैह् सर्प कौवी दे निक्के-निक्के बच्चेयाँ जो तिन्हाँ दे फर निकळनें ते पैहलैं ही खायी जाँदा था।  दोह्यो इसते बहोत दुःखी थे।  आखिर च दूंहीं अपणी दुःख भरी कथा तिस रुक्खे दे थल्लैं रैह्णे वाळे इक गिद्दड़े जो सुणायी, कनैंं तिसते एह् भी पुच्छेया कि क्या कित्ता जाये।  सर्पे वाळे घरे च रैंह्णा जानलेवा हौंदा है।      गिद्दड़ैं ग्लाया, “इसदा उपाय चतुराइया नैंं ही हौयी सकदा है।  तरकीब  लगायी नैंं दुश्मणें पर जित्त पाणा बड़ा सौखा हौंदा है।  इक बरी इक बगुला बहोत सारी उत्तम, मध्यम, अधम मच्छियाँ जो खायी करी ळाळचवश इक केकड़े दे हत्थाँ तरकीबा कन्नैंं ही मारेया गिया था।      दूंहीं पुच्छेया, “किंञा?”      ताह्लू गिद्...

2. ढोले दी पोल (पंचतंत्र-मित्रभेद)

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  पंचतंत्र दियाँ कथाँ 2.  ढोले दी पोल उआज मात्र ते डरना सही नीं हौंदा। गोमायु नाँ दा गिद्दड़ इक बरी भुक्खा-प्यासा जंगले च घुमा दा था।  घुमदा-घुमदा सैह् इक जुद्धभूमि च जाई रिहा।  तित्थू दो फौजाँ दा जुद्ध हौयी नैंं शांत हौयी गिह्या था।  अपर इक ढोल अतिह्यैं तित्थू ही पिह्या था।  तिस ढोले पर अक्खे-बक्खे दियाँ बेलाँ दे डाळू हौआ कन्नैंं हिली नैंं चोट करा दे थे।  तिन्हाँ चोटां नैंं ढोले ते बड़े जोरे दी उआज औआ दी थी।      उआज सुणी करी गोमायु बहोत डरी गिया।  तिन्नी सोच्या, इसते पैह्लैं कि एह् डरौणी उआज वाळा जानवर मिंजो दिक्खे,  मैं एत्थू ते नह्ठी जाँदा।  अपर दूजे ही क्षण तिस्सेयो याद आया कि डर कनैंं खुशी दे जोश च असाँ जो चाणचक कोई कम्म नीं करना चाहीदा।  पैहलैं  डर दी वजह दा पता करना चाहीदा। एह् सोची नैंं सैह् हौळैं-हौळैं तिस पासैं चली पिया जित्थु ते उआज औआ दी थी।  उआज दे नेडैं जाई नैंं तिस्सेयो ढोल सुज्झेया।  ढोले पर बेलाँ दे डाळू चोट करा दे थे।  गोमायु खुद तिस पर हत्थ मारना लग्गेया।  ...

1. नाहक कोशिश (पंचतंत्र-मित्र भेद)

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  उदारवादी सोच अपना कर अपनी भाषा को समृद्ध करें हिमाचल प्रदेश सरकार की वेबसाइट के अनुसार, “कांगड़ी (देवनागरी) उत्तरी भारत में बोली जाने वाली एक इंडो-आर्यन बोली है, जो मुख्य रूप से कांगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर, ऊना जिलों और हिमाचल प्रदेश के मंडी, चंबा और कुल्लू जिले के बड़े हिस्सों और पंजाब राज्य के पठानकोट, गुरदासपुर और होशियारपुर जिलों में बोली जाती है। यह कांगड़ा घाटी के लोगों से जुड़ी हुई है। कांगड़ी डोगरी और पंजाबी भाषाओं का मिश्रण है। इसे टांकरी लिपि में लिखा जाता था।” काँगड़ी बोली एक संपूर्ण भाषा होने के सभी मानकों पर खरी उतरती है।   काँगड़ी भाषा निःसन्देह सर्वगुण संपन्न भाषा है, परन्तु इसमें कभी-कभी बात को सही ढंग में कहने के लिए शब्दों की कमी खलती है।  विशेषकर जब आप दूसरी भाषाओं के लेखों का काँगड़ी में अनुवाद करते हैं तो उसमें व्यक्त सभी भावों का सही अनुवाद करने के लिए काँगड़ी में शब्द नहीं मिलते हैं।  इस कमी को दूसरी भाषाओं से शब्द लेकर पूरा करने के लिए उदारवादी सोच अपनानी  होगी। हाजिर है 'पंचतंत्र' की एक और कहानी का काँगड़ी में अन...

पंचतंत्र दियाँ कथाँ

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कहानियां दिल और दिमाग पर एक खास असर छोड़ती हैं।  कई शताब्दियां पहले आचार्य विष्णु शर्मा ने बिगड़ैल राजकुमारों को मात्र छह महीनों में कुशल राजनीतिज्ञ बनाने के लिए संस्कृत में कहानियां रची थीं। उस जगत प्रसिद्ध ग्रंथ “पंचतंत्र” का विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ है।  मैंने सत्यकाम विद्यालंकार जी द्वारा किये गये हिंदी अनुवाद का कांगड़ी में अनुवाद किया है।  आपने इन कहानियों को कहीं न कहीं जरूर पढ़ा है।  इनके मौलिक रूप का कांगड़ी में अनुवाद पढ़ कर तो देखिए।  पंचतंत्र   “आचार्य विष्णु शर्मा के जगतप्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ ‘पंचतंत्र’ के सत्यकाम विद्यालंकार द्वारा किये गये हिंदी अनुवाद का ‘काँगड़ी’ रुपाँतरण” पंचतंत्र दी कथा      देश दे दक्खण दे इक सूबे च महिलारोप्य नाँयें दा इक शहर था।  तित्थू इक महाँदानी प्रतापी राजा अमरशक्ति रैंह्दा था। तिस व्ह्ली बेशुमार धन था कनैंं अणगिणत रत्नाँ दा भंडार था अपर तिसदे पुत्र जड़-बुद्धि थे।  तिन्न पुत्र - बहुशक्ति, उग्रशक्ति  कनैंं अनंतशक्ति दे हौंदे हौयाँ भी सैह् सुखी नीं था। तिन्नों बे...